अति सूधो सनेह को मारग है,
जहाँ नेकु सयानप बाँक नहीं।
इहाँ साँचे चलैं तजि आपनपौ,
झिझकैं कपटी जे निसाँक नहीं॥

शब्दार्थ-

स्नेह का, प्रीत का मार्ग एकदम सरल है, सीधा है | इसमें थोड़ा भी चतुर व्यक्तियों वाला, सयानों वाला टेढ़ापन नहीं है, बच कर निकलने की चतुराई नहीं है | इस रास्ते पर यदि आप सच्चे हैं तो अपनी मैं को छोड़कर बिना किसी चिंता के चलते हैं, और जिनके अन्दर कपट भरा हो, या जिनके मन में शंका हो वे इस रास्ते पर चलते हुए झिझकते रहते हैं |

भावार्थ-

रे भाई, स्नेह का मार्ग तो बिलकुल सीधा है | सयानों वाला हिसाब किताब, लाभ-हानि, मैं तू इसमें नहीं है | यदि सनेह है, प्रीत है तो “मैं” कहाँ रहेगी ? और यदि “मैं” रही तो सनेह नहीं है| सच्चे हो तो “मैं” का ख़याल भी नहीं आएगा और व्यक्ति बिना किसी झूठ के मस्त गजराज की तरह बेपरवाह आगे बढेगा | और यदि सच्चे होने का कपट भर है, मन में शंकाएं भरी हैं तो झिझक होगी.. और जो झिझक रहे हैं उनके मन में या तो कपट भरा होगा या शंकाएं भरी होंगी | कपट के साथ तो सुख मिलना ही नहीं और शंका वालों के साथ सुख मिला भी तो टिकेगा नहीं |बिना पल भर समय गंवाए, इस रास्ते को छोड़कर आगे बढ़ जाओ |

और अगर तुम पूछो के सनेह के मार्ग में तुम्हें क्या मिलेगा ..? तो भाई मिलना मिलाना कुछ नहीं.. जो तुम्हारे पास है वह भी चला जाएगा | हिसाब किताब की परवाह है तो ये मार्ग तुम्हारा नहीं है, अपने जैसे ही हिसाबी किताबियों को खोजकर उनके साथ जीवन के अपने हिसाब से आनंद या कष्ट जो भी मिलें उठाते चलो |यही जीवन है |