पुरुषार्थ कीजिये.. कामना मात्र से धर्म का पालन नहीं होता.. धर्म को रक्षा की नहीं.. पालन की आवश्कता है.. रक्षा तो हमारे द्वारा पालन किया गया धर्म हमारी करेगा
प्रिय मित्रों,
कल एक पोस्ट देखी, मदर टेरेसा का एक व्यंग्य चित्र जिसमें वो एक शिशु को गोदी में लिए उसे चम्मच से खिला रही थी | चम्मच में आहार के स्थान पर बाइबिल को दिखाया गया था | पोस्ट का भाव मिशनरियों की निंदा करने वाला था, कि सेवा सिर्फ धर्म परिवर्तन के उद्देश्य से की गयी | बचाइये अपने धर्म को जो उनकी स्वार्थ परक सेवा से खतरे में आ गया है |
चलिए एक पंक्ति में मान लेते हैं कि यह सेवा-प्रलोभन-धर्म/आस्था परिवर्तन-शासन का दुष्चक्र है | प्रश्न यह है कि हमारा धर्म मात्र उन्हें कोसना है या हम भी सेवा कर सकते हैं- इस प्रश्न का सामना करना ही होगा – कुछ बिंदु विचार हेतु प्रस्तुत हैं–
1). चर्च अपने समर्थ समाज से धन एकत्र करता है तथा उसे व्यवस्थित रूप से दुष्कर क्षेत्रों में असह्य गरीबों के मध्य सेवा, प्रलोभन के माध्यम से आस्था परिवर्तन के लिए प्रयोग करता है.. मान लीजिये बहुत ही बुरा करता है … प्रश्न यह है की हमने अपने उन नितांत गरीब धर्म भाइयों की मदद के लिए कौन सा सिस्टम बनाया है जो उनकी तरह सुव्यवस्थित है.. लगातार कार्य करता है.. या ये बस सरकार का कार्य है.. हो भी सकता था लेकिन वर्तमान में सरकारें जिस तरह बनती एवं चलती हैं उस पर चर्चा करना विषय से भटकना होगा | गुरु विश्वामित्र ने श्रीराम से कहा था कि जब राजतंत्र अपने कर्तव्य का निर्वहन न कर पा रहा हो तो जन सामान्य को समाज को अपनी जिम्मेदारी उठानी पड़ती है |
2). चलिए माना कि हमने भी उठायी | हमने मंदिरों का, मठों का, धर्मार्थ संस्थाओं का निर्माण किया कि उनके माध्यमों से धन एकत्र हो तथा समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्तियों को उस धन की सहायता से समर्थ बनाया जा सके, उन्हें कौशल प्रदान कर, शिक्षित कर मुख्य धारा में लाया जा सके | मूल भावना यह कि जब संकट आये आप अपने ईश्वर को पुकारें, ईश्वर का घर कहे जाने वाले ये संस्थान उनकी मदद करें जिस से उस ईश्वर में उनकी आस्था सबल हो | किसी संकट काल में उसी ईश्वर के नाम पर सब एकत्र हो कर संकट का सामना कर सकें जिस से समाज बना रहे |
3). अब सामना कीजिये ज्वलंत प्रश्न का !! क्या हमारे द्वारा निर्मित ये संस्थाएं इस मूल उद्देश्य की पूर्ति कर पा रहीं हैं | उनकी छोड़िये.. मंदिर में दान देते वक़्त क्या हमारी यह भावना होती है की इसके माध्यम से किसी गरीब का, किसी वंचित का, किन्ही मूक पशु पक्षियों का भला हो सके.. नहीं हम तो ईश्वर को धन दे रहे हैं की वह हमारे संकटों का हरण कर हमें और अधिक सुख दें .. मन में भावना यही है ..जबकि हवा में श्लोक भी गूँज रहा होता है ..सर्वे भवन्तु सुखिनः … सर्वे सन्तु निरामया.. बस ईश्वर से कामना मात्र कर हमारा कर्तव्य पूरा हो जाता है.. सब सुखी हों.. इसके लिए पुरुषार्थ करना हमारा धर्म नहीं.. सब निरोगी हों इसके लिए स्वास्थ्य सेवाओं को उन तक पहुंचाना हमारा धर्म नहीं … कामना मात्र हमारा धर्म है.. जबकि उनके लोग दुष्कर क्षेत्रों में गरीबों के मध्य रहकर पुरुषार्थ कर रहे होते हैं..
4). ईसाई क्यों नहीं फैलें.. मुस्लिम क्यों नहीं फैलें .. उनके लोग उनके मध्य, उनकी गरीबी में रहेंगे.. उनके लिए कार्य करेंगे.. उनको जीवन जीने की वजह देंगे.. तो हम क्या चाहते है कि वे उनको वैदिक धर्म की शिक्षा देंगे.. नहीं वो निश्चय ही अपनी आस्था की ही शिक्षा देंगें.. ये तो हमें लगता है कि हमारे धर्म भाइयों को भटकाया जा रहा है.. उनके लिए तो यह दुनिया में उनके होने का..सार्थक होने का सुन्दर अहसास है जो उनके बीच है ..उनकी मदद करता है.. वो जो भी शिक्षा देंगे वाही अच्छी है |
5). प्रत्येक शहर में आज मिशनरीज के स्कूल खुलें हैं… उनमे अपने बच्चों को दाखिला दिलाने के लिए सभी प्रयासरत रहते हैं | ये सभी मूर्ख देशद्रोही लोग नहीं हैं | अन्दर से सच्चाई पता है .. बच्चों को कैसे पढ़ाना है ये वर्तमान युग में तो उन्ही को आता है | उनके सिस्टर तथा ब्रदर्स को स्कूल के बाद जाकर अपने जीवन यापन के लिए ट्यूशन/कोचिंग नहीं देने पड़ते | कदम कदम पर खुली हमारी शिक्षा की दुकानों में शिक्षित हमारे कर्णधार कक्षा बारह पास कर भी एक प्रार्थना पात्र हिंदी अथवा अंग्रेजी में लिखने में समर्थ नहीं हैं.. सरकार से आशा छोड़िये.. अपने बच्चों को सुशिक्षित करने के लिए शहर शहर में संस्थाएं बनाइये | दान के पैसे को मंदिरों मठों की तिजोरियों में बंद करने के स्थान पर उसे समाज को सुशिक्षित करने में लगाइए | उस धन से अच्छे शिक्षकों का निर्माण एवं उनकी सुरक्षा कीजिये | जिस शिक्षक को खुद नहीं आता हो उस से आप के भविष्य को क्या शिक्षा मिलेगी |
फिश को फिस कहने वाला, आशीर्वाद को आर्शीवाद लिखने वाला एक भी शिक्षक सोफिया/सेंट मेरीज़ में नौकरी नहीं पा सकता..सच्चाई आप भी जानते हैं |
6). आपने भी गुरुकुलों में सन्यासियों का, ब्रह्मचारियों का निर्माण किया, सेवा के लिए कुछ लोग चुने, उनके पादरियों, ननों, सिस्टर्स, ब्रदर्स की तरह | क्या आपके ब्रह्मचारी उनके लोगों की तरह विज्ञान, गणित की शिक्षा दे सकते हैं ..या मात्र संस्कृत ही पढ़ाएंगे उन्हें.. धर्म रक्षा के लिए.. जीवन रक्षा कौन करेगा.. सच्चाई आप भी जानते हैं सो अपने बच्चों को गुरुकुल नहीं भेज सकते.. उन्ही के स्कूल में भेजना पडेगा.. और आपको लग गया कि उनकी वजह से आपका धर्म खतरे में है |
7). निश्चय ही हमारा, आपका धर्म खतरे में है… उनकी वजह से नहीं.. हमारी वजह से… हमारा जीवन खतरे में है.. भविष्य खतरे में है..
क्या हमें पता है हमारा धर्म क्या है… जिसका पता ही नहीं उसकी रक्षा कैसे करोगे | प्रतीकों से धर्म नहीं बनता.. धर्म की सूचना देने हेतु प्रतीकों का निर्माण हुआ है.. मात्र प्रतीकों की रक्षा कर हम किसी की रक्षा नहीं कर पायेंगे..
सरकारों को.. शासन को कोसना छोड़िये.. ये तो आते जाते रहेंगे.. उठिए, एकत्र होइए और अपने चारों तरफ एक सुन्दर समाज का निर्माण कीजिये.. पुरुषार्थ कीजिये.. कामना मात्र से धर्म का पालन नहीं होता |
धर्म को रक्षा की नहीं .. पालन की आवश्कता है .. रक्षा तो हमारे द्वारा पालन किया गया धर्म हमारी करेगा |
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