जय पराजय जीवन के सम अंग हैं । हार हमें और अधिक श्रेष्ठ बनने का कारण और अवसर प्रदान करती है। जब से हम ने जीत पर अत्यधिक खुश होना और आंखे तरेरना सीखा है तभी से हम हार को पचाना, उस से ऊर्जा लेना भूल गए हैं। जीत पर बल्लियों उछलने वाले, तनिक सी हार से निराशा के अंध कूप में उतर जाते हैं । आपकी जीत हुई है..निश्चित रूप से खुश होइए..लेकिन ख़ुशी की पींग को सातवें आसमान पर मत ले जाइए, नहीं तो पेंडुलम के सिद्धांत की तरह हार की पींग सातवे पाताल सी गहरी होगी | गीता में योगेश्वर कृष्ण कह गए है..कि सुख दुःखमें समभाव रखने वाला ही स्थित प्रज्ञ धीर है | यदि पीड़ा में हैं तो शुरुआत करने के लिए शिव मंगल सिंह सुमन रचित चंद पंक्तियाँ जीवन भर का सार लिए हैं-
क्या हार में क्या जीत में
किंचित नहीं भयभीत मैं
संधर्ष पथ पर जो मिले, यह भी सही, वह भी सही,
अपने हृदय की वेदना मैं व्यर्थ त्यागूँगा नहीं,
कुछ भी करो कर्तव्य पथ से किंतु भागूँगा नहीं।
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