इंसान की मूल पहचान उसकी छतरी नहीं, उसका व्यक्तित्व है.. प्रारब्ध से किसी न किसी छतरी तले जन्म तो पाया ही है, परन्तु उस छतरी के गुण-अवगुण मात्र छतरी के नीचे होने से नहीं नहीं मिल जायेंगे | ये आपके हैं.. विशिष्ट आपके हैं जो आपको विशिष्ट बनाते हैं.. आप की पहचान आपकी छतरी नहीं , आपके गुण-अवगुण हैं |

प्रारब्ध से कोई ब्राह्मण हुआ.. जन्म के कारण ब्राह्मण छतरी पाई.. यदि विद्वता नहीं कमाई, देवत्व नहीं कमाया, ज्ञान नहीं कमाया तो बस छतरी के ब्राह्मण हुए.. और समाज ने आपको पूजा, और आपकी अयोग्यता का असत्य, सत्य दिखने के फेर में अपने ही भाइयों को अछूत बना बैठा.. शुद्ध ब्राह्मण तत्व तो वाल्मीकि को महर्षि और रैदास को पूज्य भक्त का दर्ज़ा देता था.. अयोग्यता ने जब सत्ता पाई तो योग्य दिखने के फेर में कर्म काण्ड को ब्राह्मण तत्व समझ लिया.. कर्म धारी लोगों को दलित बना दिया.. और इस पाखण्ड ने समाज को विनष्ट किया..

युग बदला फिर कुछ ऐसा समय आया कि आपकी जन्मना छतरी तले आप जलील होने लगे.. “आप” होना जलालत भरा हो गया.. आग में जलना हो गया.. आग लकड़ी को जला देती है.. विशुद्ध राख बना देती है जो रगड़े जाने पर किसी को भी शुद्ध कर देती है .. सोने को और शुद्ध कर कुंदन कर देती है.. दोनों ही तरह से आप पवित्रता पाते हैं.. आप न जले.. न कुंदन हुए.. आप ने छतरी बदल ली.. क्योंकि उसमें सुविधा थी.. छतरी बदलकर कुछ और दिखने के असत्य ने आपको और डराया.. आप डरे और निडर दिखने के फेर में अत्याचारी हुए.. अच्छा था या तो राख हो जाते या कुंदन बन जाते.. आप कुछ नहीं हुए.. और कुछ दिखने के फेर में राक्षस बन और जलील हुए..

समय फिर बदला है.. बदलाव तो समय का विशिष्ट गुण है.. कुंदन होने के लिए अपनी जड़ों को पहचानिए, अपने गुण अवगुण पहचानिए.. मात्र छतरी तले होने की जिद से, मात्र छतरी बदल लेने से, मात्र मुलम्मा चढ़ा लेने से आप न कुंदन बनेंगे न शुद्ध करने वाली राख.. आप स्वयं होइए.. पहले मानव होइए.. फिर अपनी जड़ों को देखकर.. अपने गुण अवगुण पहचान कर कोई भी छतरी पा लीजिये.. अप्प दीपो भवः.. अपना प्रकाश स्वयं बनिए.. सम्मान पाना है तो असत्य को त्यागिये.. सत्य किसी भी छतरी तले हो.. पूज्य ही होता है.. सम्मान पाता है.. जो आप हैं.. वही दिखिए.. सत्य को धारण कीजिये फिर कोई आपको जलील करने का भाव तक नहीं रख पायेगा..